प्रादेशिक मौसम केंद्र, नागपुर
भारत मौसम विज्ञान विभाग, पृथ्‍वी विज्ञान मंत्रालय
भारत सरकार
बुधवार, 28 अक्टूबर 2020
04:25:29 पूर्वाह्न (भा. मा. स.)
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  भारत में मौसम विज्ञान सेवा का इतिहास  
 
 
 
 
भारत में मौसम विज्ञान की शुरुआत का प्राचीन काल से ही पता लगाया जा सकता है। 3000 ईसा पूर्व के युग के प्रारंभिक दार्शनिक लेखन, जैसे की उपनिशदों में बादल के गठन और बारिश के साथ पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर परिक्रमा के कारण ऋतु चक्र की प्रक्रिया के बारे में गंभीर चर्चा की गई हैं। वराहमिहिर के शास्त्रीय कार्य, बृहत्संहिता, 500 ईस्वी के आसपास लिखा, एक स्पष्ट सबूत है कि वायुमंडलीय प्रक्रियाओं का एक गहरा ज्ञान उन दिनों में भी अस्तित्व में था। यह माना जाता था कि बारिश सुर्य से आती है (आदित्यात जायते वृष्टि) और बरसात के मौसम में अच्छी वर्षा भरपूर कृषि और लोगों के भोजन के लिए महत्वपूर्ण है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में देश के राजस्व और राहत कार्य के लिए वर्षा के वैज्ञानिक मापन और उसके उपयोग के रिकॉर्ड शामिल है। कालिदास ने सातवीं शताब्दी के आसपास लिखे अपने महाकाव्य 'मेघदूत', में मध्य भारत में मानसून के आगमन की तारीख और मानसून के बादलों की राह का भी उल्लेख किया है।

कहा जा सकता है कि, मौसम विज्ञान, जैसा कि अब हम मानते है, को 17 वीं सदी में थर्मामीटर के आविष्कार और बैरोमीटर एवं वायुमंडलीय गैसों के व्यवहार से संबंधित कानूनों के निर्माण के बाद अपना फर्म वैज्ञानिक आधार मिला। 1636 में हैली, एक ब्रिटिश वैज्ञानिक, ने भारतीय समर मानसून पर अपना ग्रंथ प्रकाशित किया जिसमें उन्होने एशियाई देश और हिंद महासागर की हीटिंग के अंतर को हवाओं की मौसमी उत्क्रमण का कारण बताया।

भारत भाग्यशाली है कि दुनिया की सबसे पुरानी मौसम वेधशालाओं में से कुछ यहाँ पर स्थित है। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने मौसम और भारत की जलवायु के अध्ययन के लिए कई ऐसे स्टेशनों की स्थापना की, उदाहरण के लिए, 1785 में कोलकाता और 1796 में मद्रास (अब चेन्नई)। बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी जिनकी स्थापना 1784 में कोलकाता और 1804 में बंबई (अब मुंबई) में की गई, इन्होने भारत में मौसम विज्ञान में वैज्ञानिक अध्ययन को बढ़ावा दिया। 1835-1855 के दौरान कप्तान हैरी पिडिंगटन ने कोलकाता में एशियाटिक सोसाइटी के जर्नल में उष्णकटिबंधीय तूफान से सम्बंधित 40 पत्र प्रकाशित किये और "चक्रवात" शब्द गढ़ा। 1842 में उन्होंने अपने स्मारकीय काम "तूफान के कानून" का प्रकाशन किया। 19वीं सदी की पहली छमाही में, भारत में कई वेधशालाओं का कार्यरत प्रांतीय सरकारों के तहत शुरू हुआ।

1864 में कोलकाता एक विनाशकारी उष्णकटिबंधीय चक्रवात के घेरे मे आया और इसके बाद 1866 और 1871 में मानसून की वर्षा में विफलताऐं प्राप्त हुई। साल 1875 में भारत सरकार द्वारा भारत मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना हुई, जिसके तहत सभी मौसम संबंधी कार्य एक केंद्रीय अधिकार के अंतर्गत लाए गऐ। श्री एच एफ ब्लैनफोर्ड को भारत सरकार के लिए मौसम विज्ञान रिपोर्टर नियुक्त किया गया। सर जॉन एलियट को वेधशालाओं के पहले महानिदेशक के रूप में कोलकाता मुख्यालय में मई 1889 में नियुक्त किया गया। भारत मौसम विज्ञान विभाग का मुख्यालय पहले शिमला में, फिर पूना (अब पुणे) में और अंत में नई दिल्ली में स्थानांतरित किया गया।

1869 में मेयो अस्पताल परिसर में पहली वेधशाला की स्थापना के साथ नागपुर क्षेत्र में मौसम की सेवाएं शुरू की गई। बाद में, साल 1947 में एक वर्गिय वेधशाला के रूप में मौसम विज्ञान कार्यालय की स्थापना नागपुर हवाई अड्डे पर की गई। 1 अप्रैल 1954 को प्रादेशिक मौसम केंद्र नागपुर की स्थापना हवाई अड्डे के टर्मिनल भवन के सामने की गई। प्रादेशिक मौसम केंद्र नागपुर, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों एवं महाराष्ट्र राज्य के अधीन विदर्भ क्षेत्र की सभी वेधशालाओं का अनुरक्षण करता है।







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